एक भाषा ऐसी भी जिसे कहते खामोशी है।

दुःख मे खामोशी, कुछ बयाँ न कर पाने की खामोशी,

सूख मे खामोशी,प्यार मे खामोशी,

कहीं न कहीं भीषण शोर मे भी होती है ये खामोशी।

इसीलिये तो, कुछ न कहे भी बहुत कुछ कह जाती है ये खामोशी।

 

जितनी छुपा लो अपनी भावनाओं को खामोशी मे,

चाहे छुपा लो उन सरगरमीयो को भी,

या धारण कर लो तुम सदा के लिए मौन।

पर कैसे छुपा पाओगे उन खामोशियो को खामोशी मे।

क्योंकि, बिन कुछ कहे,बहुत कुछ कह जाती है ये खामोशी।

 

कहीं मजबूत तो कहीं कमजोर है ये खामोशी,

ज़रा सोचो और परखो उन अद्भुत जनों की वाणी,

नमन है उनके इस महान सामंजस्य की,

बस इशारों मे ही बाँट लेते सारी ख़ुशि।

 

कहते है,प्यार मे आँखों की भाषा कही जाती है,

बहार तो खामोशी होती पर,

मन मे शब्दों की माला बुनी जाती है।

पढ़ लेते वे एक-दूसरे की आँखे,

शायद इसी तरह अमर-प्रेम की गाथा बुनी जाती है।

और! विस्मृति मे भी इतना कुछ कह जाती है ये खामोशी।

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